भारतीय राजनीति और शासन

उद्देशिका (Preamble)

प्रस्तावना के चार मूल तत्व:

  1. संविधान के अधिकार का स्रोत – संविधान भारत के लोगों से शक्ति अधिगृहित करता
    है।
  2. भारत की प्रकृति – इसके अनुसार भारत एक संप्रभु धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक
    समाजवादी व गणतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है।
  3. संविधान के उद्देश्य – न्याय, समता, बंधुत्व व स्वतंत्रता
  4. संविधान के लागू होने की तिथि

प्रस्तावना में उल्लेखित मुख्य शब्द एवं उनके अर्थ:

  • संप्रभुता – भारत ना तो किसी अन्य देश पर निर्भर करता है और ना ही किसी
    अन्य देश का डोमिनियन है।
  • धर्मनिरपेक्ष – धर्मनिरपेक्ष राज्य शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है।
    हमारे देश में सभी धर्म समान हैं और उन्हें सरकार का समान समर्थन प्राप्त है।
  • समाजवादी – भारतीय समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद है ना कि सम्यवादी
    समाजवाद। लोकतांत्रिक समाजवाद मिश्रित अर्थव्यवस्था में आस्था रखता है।
  • लोकतांत्रिक – अर्थात सर्वशक्ति जनता के हाथों में है।
  • गणतंत्र – भारत का प्रमुख अर्थात राष्ट्रपति चुनाव के जरिए सत्ता में आता है और
    उनका चुनाव 5 वर्षों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। किसी भी विशेषाधिकार
    प्राप्त वर्ग की अनुपस्थिति होती है।
  • स्वतंत्रता – लोगों की गतिविधियों पर किसी प्रकार के रोक-टोक की अनुपस्थिति
  • हमारी प्रस्तावना में स्वतंत्रता बंधुत्व और क्षमता के आदर्शों को फ्रांस की क्रांति
    1789-99) से ली गई है।
  • समता – इसका अर्थ है, समाज के किसी भी वर्ग के लिए विशेष अधिकारी की
    अनुपस्थिति। भारतीय संविधान हर नागरिक को स्थिति और अवसर की समता प्रदान
    करती है।
    • नागरिक को प्रदान की गई समता: नागरिक, राजनीतिक व आर्थिक
      समता

✅वन-लाइनर तथ्य

  • संविधान में प्रस्तावना को सर्वप्रथम सम्मिलित किया था – अमेरिका ने
  • प्रस्तावना को ‘संविधान का परिचय पत्र’ कहा था – एन. ए. पालकीवाल ने
  • संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ – 13 दिसंबर 1946 को
  • भारतीय संविधान का कौन सा भाग भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में वर्णित
    करता है – भारतीय संविधान की प्रस्तावना
  • भारतीय संविधान का कौन सा भाग संविधान की आत्मा कहा जाता है – उद्देशिका
  • भारत के गणतंत्र होने का अर्थ क्या है – भारत में वंशानुगत शासन नहीं है।
  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसा किस वाद में कहा गया, कि अनुच्छेद-368 के अंतर्गत
    संविधान के प्रस्तावना में भी संशोधन किया जा सकता है, परंतु यह मूल ढांचे का उल्लंघन
    करने वाला नहीं होना चाहिए – केशवानंद भारती वाद, 1973
  • उद्देशिका में सम्मिलित सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय किससे संबंधित है –
    1917 की रूसी क्रांति से
  • “उद्देशिका संविधान का अभिन्न अंग है” धारणा संबंधित है – एस. आर. बोम्मई बनाम
    यूनियन ऑफ इंडिया वाद से
  • भारतीय संविधान की उद्देशिका में संशोधन किया गया था – 42 वें संविधान संशोधन के
    तहत
  • संविधान की प्रस्तावना में जिन आदर्शों एवं उद्देश्यों की रूपरेखा दी गई है, उनका
    विस्तार कहां पर किया गया है – मूल अधिकारों, राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांतों एवं
    मौलिक कर्तव्यों के अध्याय के तहत
  • 42वें संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में किन शब्दों को सम्मिलित किया गया –
    समाजवादी (Socialist), अखंडता (Integrity), तथा पंथनिरपेक्ष (Secular)
  • उद्देशिका को राजनीतिक जन्मपत्री की संज्ञा दी – के. एम. मुंशी ने
  • “प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है” उच्चतम न्यायालय ने यह मत किस वाद में व्यक्त
    किया था? – बेरुबारी संघ मामले में (1960)


भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक गणतंत्र के रूप में घोषित किया गया है।
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“संविधान की प्रस्तावना हमारे दीर्घकालिक सपनों का विचार है” – सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर (महत्त्वपूर्ण संविधान निर्माताओं में से एक)

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गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के मामले में न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्लाह ने उद्देशिका को संविधान की मूल आत्मा कहा है।

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